राजस्थान में खाली पड़े हैं बोर्ड-आयोग के पद, क्या सोच रही है सरकार? राजनीतिक नियुक्तियों पर अभी भी चुप्पी
Rajasthan Board Appointements: राजस्थान में बीजेपी सरकार के 15 महीने बीतने के बावजूद कई बोर्ड और आयोगों में राजनीतिक नियुक्तियां नहीं हो पाई हैं। विधानसभा में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री अविनाश गहलोत ने कहा कि ये नियुक्तियां राज्य सरकार का नीतिगत निर्णय हैं और समय आने पर की जाएंगी। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने चुनाव से पहले कई आयोगों का गठन किया था, जिनमें से अधिकतर में नियुक्तियां अधूरी रह गई थीं। अब बीजेपी सरकार से भी इन पदों को भरने की मांग तेज हो रही है। पार्टी कार्यकर्ताओं में भी इस देरी को लेकर बेचैनी है।

राजस्थान की राजनीति में इस समय एक सवाल बार-बार उठ रहा है—आख़िर बीजेपी सरकार बनने के 15 महीने बाद भी बोर्ड और आयोगों में राजनीतिक नियुक्तियां क्यों लंबित हैं? यह मुद्दा न केवल विपक्ष के लिए सवाल बन रहा है, बल्कि पार्टी के भीतर भी असंतोष की वजह बनता जा रहा है।
कांग्रेस सरकार के फैसलों पर उठा था विवाद
पूर्ववर्ती गहलोत सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम चरण में 36 बोर्ड और आयोगों का गठन किया था, जिनमें से 26 तो ठीक चुनाव से छह महीने पहले बनाए गए थे। इन संस्थाओं के गठन को राजनीतिक लाभ की दृष्टि से देखा गया और आलोचना भी हुई कि कई जगह सिर्फ नाम की नियुक्तियां की गईं, जबकि बड़ी संख्या में पद रिक्त ही रह गए।
अब बीजेपी सरकार पर भी उठे सवाल
विधानसभा में शुक्रवार को इस मसले पर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री अविनाश गहलोत ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, “पूर्ववर्ती सरकार ने नियुक्तियों को राजनीतिक उद्देश्य से देखा। हमारी सरकार सोच-समझकर, नीति के तहत निर्णय ले रही है। अब तक अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास आयोग और देवनारायण बोर्ड में ही नई नियुक्तियां की गई हैं।”
‘नीतिगत निर्णय है राजनीतिक नियुक्ति’—सरकार का रुख साफ
विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान जब विधायक ने पूरक प्रश्न के तहत अन्य नियुक्तियों का जिक्र किया, तो मंत्री ने दोहराया कि बाकी बोर्डों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति एक नीतिगत निर्णय है, जिसे सरकार समय और आवश्यकता के अनुसार लेगी। फिलहाल बजट की आवश्यकता अनुसार आवंटन किया गया है।
पार्टी कार्यकर्ताओं के भीतर बढ़ रहा है असंतोष
भाजपा के कई कार्यकर्ता और समर्थक, जो चुनावी मैदान में पार्टी के लिए जी-जान से लगे रहे, अब खुद को नजरअंदाज़ महसूस कर रहे हैं। ऐसे में बोर्ड और आयोग में राजनीतिक नियुक्तियां अब सिर्फ प्रशासनिक मसला नहीं, बल्कि एक राजनीतिक चुनौती भी बनती जा रही है।