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Shitala Ashtami 2025: नागौर में शीतला सप्तमी नहीं, अष्टमी पर होती है पूजा—राजा अमर सिंह राठौड़ की स्मृति में मनाया जाता

Sheetla Ashtami Pooja: राजस्थान के नागौर जिले में शीतला सप्तमी के दिन पूजा नहीं बल्कि शोक मनाया जाता है। कारण है 18वीं सदी में इसी दिन राजा अमर सिंह राठौड़ की मृत्यु, जिसे आज भी स्थानीय लोग एक भावनात्मक स्मृति के रूप में मानते हैं। नागौर में शीतला माता की पूजा अष्टमी को की जाती है, जबकि बासी भोजन सप्तमी को ही तैयार कर लिया जाता है। यह परंपरा नागौर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है, जो आज भी सजीव है।

Shitala Ashtami 2025: नागौर में शीतला सप्तमी नहीं, अष्टमी पर होती है पूजा—राजा अमर सिंह राठौड़ की स्मृति में मनाया जाता

राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत जितनी समृद्ध है, उतनी ही अनूठी भी। त्योहारों और परंपराओं को लेकर यहां की मिट्टी में विशेष भावनात्मक जुड़ाव देखने को मिलता है। ऐसा ही एक उदाहरण नागौर जिले में देखने को मिलता है, जहां शीतला सप्तमी को पूजा के बजाय शोक के रूप में याद किया जाता है। जबकि बाकी राज्य और उत्तर भारत के हिस्सों में इस दिन को उत्सव के रूप में मनाया जाता है, नागौर में यह दिन एक ऐतिहासिक घटना की स्मृति में खास मायने रखता है।

राजा की मृत्यु बनी परंपरा की दिशा
नागौर के इतिहास में दर्ज एक दुखद दिन, जब 18वीं सदी में इसी तिथि को नागौर राजघराने के वीर और सम्मानित राजा अमर सिंह राठौड़ का निधन हो गया था। इस अशुभ घटना के बाद नागौरवासियों ने निर्णय लिया कि इस दिन कोई मांगलिक कार्य या पूजा नहीं होगी। तभी से यहां शीतला सप्तमी की पूजा नहीं होती और अष्टमी के दिन माता शीतला की आराधना की जाती है।

बासी खाने की विशेष परंपरा
पूरे राजस्थान में जहां सप्तमी को शीतला माता की पूजा होती है और एक दिन पहले बासी खाना बनाया जाता है, वहीं नागौर में यह खाना सप्तमी को ही तैयार किया जाता है ताकि अष्टमी को माता को ठंडा भोग लगाया जा सके। त्रिकुटा सब्जी, मठरी, पापड़ी, सूखी सब्जी और पूरियां—ये सभी व्यंजन कई घरों में एक दिन पहले ही बन जाते हैं और श्रद्धा से माता को अर्पित किए जाते हैं।

शीतला अष्टमी का पुण्य महत्व
विश्व हिंदू परिषद के पुखराज सांखला बताते हैं कि नागौर में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। लोग इसे श्रद्धा, इतिहास और संस्कृति का संगम मानते हैं। यहां अष्टमी की सुबह सूरज निकलने से पहले महिलाएं माता को भोग लगाती हैं और फिर परिवारजन उसी बासी भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।